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Founder Editor(Print): late Shyam Rai Bhatnagar (journalist & freedom fighter) International Editor : M. Victoria Editor : Ashok Bhatnagar *
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4 फ़र॰ 2013

बलात्कार से जुड़े अध्यादेश से महिला संगठन नाराज़


देश भर के प्रमुख महिला संगठनों ने महिलाओं के प्रति होने वाले यौन अपराधों पर यूपीए सरकार द्वारा लाए जा रहे अध्यादेश को ‘जनता के साथ धोखा’ करार दिया है.
महिला संगठनों ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से गुजारिश की है कि इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर ना करें.
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली वृंदा ग्रोवर ने पीटीआई से कहा, “ये अध्यादेश जनता के भरोसे के साथ धोखा है. जिस तरह से सरकार हड़बड़ी में बिना किसी पारदर्शिता के साथ इस अध्यादेश को लेकर आई हैं उसे लेकर हम चिंतित हैं.”
कई संगठनों से जुडी महिला कार्यकर्ताओं ने कहा है कि जब संसद का सत्र कुछ हफ्ते बाद होने वाला है तो सरकार ने अध्यादेश क्यों जारी करने का फैसला किया.
"ये अध्यादेश जनता के भरोस के साथ धोखा है. जिस तरह से सरकार हड़बड़ी में बिना किसी पारदर्शिता के साथ इस अध्यादेश को लेकर आई हैं उसे लेकर हम चिंतित हैं."
वृंदा ग्रोवर
ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमेंस एसोसिएशन की कविता कृष्णन का कहना है, “इस अध्यादेश में जी एस वर्मा कमेटी के कई सुझावों को दरकिनर कर दिया गया है. सरकार ने इस अध्यादेश को जनता के साथ साझा नहीं किया है और ना ही इन बदलावों पर चर्चा या बहस हुई हैं.”
महिला संगठनों का मानना है कि सरकार को इस मामले में संपूर्ण सोच के साथ काम करना चाहिए था.
महिला संगठनों की आपत्ति है कि संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं पर होने वाली हिंसा जैसे मसलों को इस अध्यादेश में कोई जगह नहीं मिली है.
संगठनों ने कहा हैं, “शादी के तहत होने वाले बलात्कारों, समलैंगिकों के हितों को इस अध्यादेश में नकारा गया है. इतना ही नहीं जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट में मृत्यु दंड ना दिए जाने के सुझावों को भी सरकार ने नकार दिया है.”
महिला संगठन मांग कर रहे हैं कि सरकार को पीडित महिलाओं के पुनर्वास, निर्धारित समय में मामलों का निपटारा, आर्थिक रुप से कमज़ोर वर्गो को यौन अपराधों से कैसे बचाया जाया जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.

'माया' का आनंद 757 करोड़ का


प्रदेश की पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती लाख कहें कि उन्होंने या उनके परिवार के किसी सदस्य ने या उनके किसी राजनीतिक सहयोगियों ने पिछले 5 वर्षों के दौरान जब प्रदेश में बसपा की सरकार थी तब कोई भी आर्थिक लाभ नहीं उठाया, यह बात सही नहीं है।

जानकारी सामने है कि मायावती के छोटे भाई आनंद की कंपनियों के खातों में हजारों करोड़ के नकद वित्तीय लेनदेन हुआ था। इस धनराशि का स्रोत स्त्रोत क्या है! स्पष्ट नहीं है यह जानने के लिए देश के प्रवर्तन निदेशालय ने मायावती के भाई आनंद की कंपनियों की जांच शुरू कर दी है। यह जानकारी वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने उजागर की है।

कंपनी मामलों के रजिस्ट्रार के समक्ष फाइल किए गए कागजातों में यह बात सामने आई है कि मायावती के भाई आनंद की कंपनियों द्वारा साधारण व्यापार किया गया, किन्तु 2007 में बहुजन समाज पार्टी की सरकार और मायावती के मुख्‍यमंत्री बनते ही अन्य कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर वित्तीय लेनदेन किया गया।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव किरीट सोमैया के हवाले से अब यह बात उजागर हो गई है कि पूर्व मुख्‍यमंत्री के भाई आनंद कुमार की कंपनियों में हजारों करोड़ का वित्तीय लेनदेन हुआ है। उनका दावा है कि मायावती के भाई आनंद कुमार की सात कंपनियों को 2007-2012 के दौरान 5 वर्ष में करीब 757 करोड़ मिले जब मायावती सत्ता में थीं। 

भाजपा ने मायावती सरकार के घोटालों को वर्ष 2011 में ही उजागर कर दिया था। भाजपा ने देश के राष्ट्रपति को 13 जुलाई 2011 को ही विस्तृत ज्ञापन सौंपकर संबधित साक्ष्य सौंप दिए थे। भाजपा ने 28 जुलाई 2011 को ही मायावती के भाई आनंद कुमार की बोगस कंपनियों की जानकारी उजागर कर दी थी। भाजपा नेताओं विशेषकर किरीट सोमैया ने 30 दिसम्बर 2011 को ही व्यक्तिगत रूप से सीबीआई मुख्‍यालय में अधिकारियों से मिलकर शिकायत दर्ज कराई थी और मायावती के भाई आनंद कुमार की 300 बोगस कंपनी के साक्ष्य उपलब्ध कराए थे। 
भारतीय जनता पार्टी ने 2011 में विधानसभा चुनाव के दौरान विभिन्न अधिकारियों को यह रिपोर्ट सौंपी थी कि आनंद कुमार ने 76 कंपनियां चालू कर रखी हैं और अवैध कामों के लिए रखे हुए कालेधन को सफेद बनाकर आय से अधिक सम्पत्ति बना रहे हैं।
भाजपा का आरोप था कि आनंद की इन कंपनियों ने टैक्स हैवन में शामिल कंपनियों में निवेश किया है। यह भी कहा गया था कि मुख्‍यमंत्री के साथ उनके संबधों का गलत और गैर कानूनी तरीके से फायदा उठाया जा रहा है। 


आनंद की कंपनियों में गोपनीय और अज्ञात सम्पत्ति की बिक्री से प्राप्त लाभ और झूठी कंपनियों की बढ़ी हुई दरों पर शेयरों की बिक्री सहित ऐसी नकदी का प्रवेश हुआ है जो अभी रहस्य बनी हुई है। आनंद कुमार की घाटे में चल रही कंपनी द्वारा तीसरे पक्ष से अनिर्दिष्ट सेवाओं के लिए एडवांस लेने वाले राबर्ट वाड्रा मामले जैसी प्रक्रिया अपनाई गई है।

उल्लेखनीय है कि 37 वर्षीय आनंद कुमार पहले नोयडा अथॉरिटी में क्लर्क थे। आनंद कुमार की सबसे पुरानी कम्पनी होटल लाइब्रेरी क्लब प्रालि है, जिसका अस्तित्‍व 1987 में आया था जिसके द्वारा होटल शेल्टन मंसूरी में चलता था। इस कंपनी की शेयर पूंजी 24 लाख थी। इस कंपनी के मालिक आनंद कुमार और उनकी पत्नी विचित्रलता थीं। वर्ष 2007-08 में होटल व्यापार से उनकी आय 25 लाख थी।

वर्ष 2011-12 में इस कंपनी ने 80 लाख का घाटा प्रदर्शित किया किन्तु कंपनी ने 152 करोड़ गोपनीय निवेश की बिक्री से प्राप्त किए। पिछले 5 वर्षों में इस कंपनी ने नकद 346 करोड़ इसी प्रकार गोपनीय निवेश की बिक्री से प्राप्त किए। भारत के कम्पनी मामलों के रजिस्ट्रार के समक्ष यह विवरण उजागर नहीं किया गया है कि असल में निवेश क्या था और इनकी बिक्री किसको की गई थी? 

प्रश्न यह है कि आनंद कुमार की कंपनियों द्वारा प्राप्त इस धनराशि के आय का स्त्रोत क्या है। एक लाख के निवेश पर जो भारी लाभांश स्वीकार किया गया, वह कैसे और क्यों प्राप्त किया गया? 

बसपा प्रमुख को और भी कई सवालों का सामना करना होगा। उनके जवाब देने होंगे। बहुजन समाज पार्टी केन्द्र में यूपीए सरकार की सहयोगी है। मल्टी ब्राण्ड रिटेल में एफडीआई पर बहस के दौरान मायावती के पैंतरे देख चुके हैं। 

अब भाजपा ने मायावती के भाई आनंद कुमार की कंपनियों पर लगे आरोपों की वित्त मंत्रालय से जांच की मांग की है और कहा कि वित्त मंत्रालय इन कंपनियों को नोटिस दे। आनंद कुमार की कंपनियों के कार्यक्षेत्र की जांच कराई जाए। कम्पनी मामलों के मंत्रालय को चाहिए कि वह इन कंपनियों के कागजों की तलाशी ले और उन्हें जब्त कर ले।

विकास दर के घोड़े पर सवार महंगाई

महंगाई ने देश की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जीवनरक्षक बुनियादी सुविधाओं से वंचित कर दिया है। इस वजह से गत कुछ वर्षों में आम जनता का एक बड़ा वर्ग भुखमरी या कुपोषण की चपेट में आया है। महंगाई की दर लंबे समय से सात प्रतिशत के ऊपर बनी हुई है। 

निरंतर बढ़ी महंगाई ने पुरानी गरीबी रेखा को अप्रासंगिक कर दिया है। जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, फिर भी सरकार के लिए यह कोई मुद्दा नहीं है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार न सिर्फ अंधी व बहरी हो चुकी है, बल्कि अब भी लगातार महंगाई बढ़ाने वाले कदम उठाए जा रही है। सवाल उठता है कि वर्तमान सरकार की चिंता के केंद्र में महंगाई का मुद्दा क्यों नहीं है? 

वह इतनी लाचार एवं बेबस क्यों है? महंगाई बढ़ने के वास्तविक कारण क्या हैं तथा सरकार उनसे निपटने में किस हद तक सक्षम है? क्या आने वाला समय आम जनता को महंगाई से राहत दे पाएगा? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें भारतीय अर्थव्यवस्था एवं राजनीति की कुछ वर्तमान सचाइयों से रूबरू होना पड़ेगा।

सरकार की वर्तमान प्रवृत्ति बहुराष्ट्रीयकरण की है और चाहे जो हो जाए, वह अपने इस रुख पर तनिक भी समझौता करने को तैयार नहीं है। इस समय आर्थिक विकास दर सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। यही वजह है कि महंगाई की तुलना में कुछ अन्य मुद्दे जैसे-बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश, खुदरा क्षेत्र में एफडीआई, वायदा कारोबार में कृषि जिंसों को शामिल करना, शेयर बाजार को विभिन्न विदेशी मुद्राओं में वायदा कारोबार की अनुमति देना, अमेरिकी सरकार या अमेरिकी मीडिया एवं कॉरपोरेट ताकतों की नजर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रेटिंग सुधारना आदि सरकार की प्राथमिकता सूची में काफी ऊपर रहे हैं।

इनमें से एक भी मुद्दा ऐसा नहीं है, जिसका महंगाई को हवा देने में प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान न हो। जाहिर है, सरकार की प्राथमिकता महंगाई को कम करने के बजाय बढ़ाने की है, क्योंकि इससे मंदीग्रस्त अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। सचमुच, महंगाई तो आर्थिक विकास दर एवं एफडीआई (अर्थात बहुराष्ट्रीयकरण) के घोड़े पर ही सवार है। दुर्भाग्य है कि महंगाई अब विपक्ष के लिए भी ज्यादा महत्व का मुद्दा नहीं रहा। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष की स्थिति लगभग एक जैसी ही है। सिक्के भले ही दो हों, पर पहलू दोनों के एक ही हैं। 

वास्तव में महंगाई के मांग-आपूर्ति आधारित परंपरागत सिद्धांत अब धराशायी हो गए हैं और इसका घटना-बढ़ना बहुत कुछ वैश्विक कारकों से तय होने लगा है। सरकार ने कुछ वर्षों पहले कृषि जिंसों को वायदा कारोबार के लिए खोल दिया। इससे कृषि जिंसों की महंगाई निरंतर बढ़ती गई है। सरकार ने सेबी को यूरो, पाउंड और येन जैसी अन्य विदेशी मुद्राओं में भी वायदा कारोबार की अनुमति पहले ही दे दी थी। अतः कृषि जिंसों की कीमतों पर अनावश्यक दबाव बनना स्वाभाविक था। देखते-देखते आलू, टमाटर, प्याज, चना, मूंगफली, राजमा आदि के मूल्य आसमान छूने लगे। अब तो देश की अर्थव्यवस्था में कभी भी हलचल पैदा कर देना सटोरियों के हाथ में है। 

धीरे-धीरे देश की पूरी अर्थव्यवस्था के नियामक की भूमिका में अंतरराष्ट्रीय सटोरिये आते जा रहे हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री केन्स ने सट्टाबाजारी से उत्पन्न पूंजीवादी अराजकता से बचने के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप का सुझाव दिया था। उन्होंने वित्तीय पूंजी को कभी अंतरराष्ट्रीय रूप न लेने देने की वकालत करते हुए राष्ट्र-राज्यों को अपनी सीमाओं में पूरे हस्तक्षेप करने की बात कही थी, लेकिन आज सब कुछ उलट गया है। 

सट्टाबाजारी एवं अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी सरकार की पकड़ से बाहर होकर खुद सरकार बनाने-बिगाड़ने, उसकी रेटिंग या भविष्य तय करने की भूमिका में है। आलम यह है कि अंतरराष्ट्रीय सटोरियों की भूमिका निरंतर मजबूत हो रही है और सरकार के सभी बड़े फैसलों पर उनका प्रभाव स्पष्ट तौर पर दिख रहा है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार वायदा कारोबार को और अधिक अधिकार देने की बात पर अड़ी है। लिहाजा इस पूरे परिदृश्य का आकलन कर महंगाई नियंत्रित करने में सरकार की सीमाओं या मजबूरियों को सहज ही समझा जा सकता है। 

मोदी की उम्मीदवारीः कितने सीएम साथ, कितने खिलाफ

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की पीएम उम्‍मीदवारी में राजग शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की राय भी बहुत मायने रखती हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ नहीं हैं, राजग शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी मोदी के बारे में अब तक अपनी राय जाहिर नहीं की है। ऐसे में नरेंद्र मोदी की पीएम उम्मीदवारी की कितनी संभावना है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। 

भाजपा नीत राजग गठबंधन फिलहाल गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, कर्नाटक पंजाब और गोवा में सत्‍ता में है। इनमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोदी के धुर विरोधी है। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री के रूप में उनकी पहली पसंद अरुण जेटली हैं। 

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बारे में अब तक कोई राय नहीं बन पाई है। वे खुद भी प्रधानमंत्री पद की रेस में शामिल हैं। मोदी पर मचे घमासान को देखते हुए ऐसी भी संभावना है कि अंतिम समय में पीएम उम्‍मीदवार के रूप में उनका नाम उभर कर सामने आ जाए। 

मौजूदा समय में छत्‍तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह व अकाली दल मोदी के पक्ष में है। एनडीए का विस्तार करने के लिए भाजपा की जिन दलों पर नजर है उनमें जयललिता की अन्नाद्रमुक और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस है। जयललिता मोदी को समर्थन दे सकती है लेकिन ममता बनर्जी सेक्यूलरिज्‍म के नाम पर मोदी के खिलाफ ही रहेंगी। 

राजग के अन्य सहयोगी दलों में शिवसेना सुषमा स्वराज के पक्ष में अपनी राय जाहिर कर चुकी है। हरियाणा में भाजपा की सहयोगी हरियाणा जनहित कांग्रेस भी सुषमा के साथ रहेगी, जबकि टीडीपी व तेलंगाना राष्ट्र समिति के लिए भी मोदी के नाम पर सहमत होना आसान नहीं होगा। 

बहरहाल, आगामी लोकसभा चुनाव में उतरने की तैयारी में जुटी भाजपा को अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता की कमी खल रही है, जो एनडीए के सर्वमान्य नेता थे। भाजपा मानती है कि आज का एनडीए 1996 के एनडीए से काफी अलग है। आज इसमें केवल सात दल हैं। साथ ही वाजपेयी जैसा नेता भी नहीं है।

ऐसे में अगर चुनाव बाद केंद्र में एनडीए की सरकार बनने की संभावना बनी तो राजग के घटक दल भाजपा की बजाए नेताओं के नाम पर समर्थन देंगे। मोदी के नाम पर कांग्रेस को शिकस्त देने की रणनीति पर काम कर रही भाजपा भी जानती है कि उनका पीएम तभी बन सकता है जब वह अकेले दम पर 150-160 सांसदों का आंकड़ा पार कर ले। इतनी संख्या जुटाने के बाद एनडीए का कारवां भी बढ़ जाएगा।